लो आखिर खत्म हुआ इंतज़ार,
आ ही गया होली का त्यौहार।
अब सब दुख मिट जाएगा,
जब झूम उठेगा सारा संसार।
होली यानी रंगों का त्यौहार,
रंग ,अबीर और ढेर सारा गुलाल।
किसी के लिए पिचकारी,
तो किसी के लिए ढेर सारा प्यार।
पर जाने क्यों दिल है उदास,
शायद अब पहले जैसी रही नहीं बात।
कुछ हम बदले हैं, कुछ बदले हैं हालात,
अब रंग भी लगते हैं उदास।
ऐसा नहीं कि रंगों से प्रीत नहीं,
बस कुछ छूटा है जो ठीक नहीं।
बदलाव तो प्रकृति का नियम है,
पर यह बदलाव कुछ ठीक नहीं।
छूट गया अब बचपन,
नहीं रही अब वो बात।
सुबह क्या, शाम क्या,
वो गुलाल उड़ाना दिन-रात।
करते थे बेसब्री से,
हम होली का इंतज़ार।
गुब्बारे, पानी, रंग और,
पिचकारी खरीदते थे हज़ार।
अब तो बस नाम है,
कहाँ रहा कोई त्यौहार।
बस रस्म निभाने को ,लगा लेते हैं थोड़ा गुलाल,
लो हो गया त्यौहार…
क्या यही होली है?
चलो मनाएं होली एक नए तरीके से,
भुलाकर सारे गिले-शिकवे,
मिटा दें दर्द अब सीने से।
जो रूठ गए हैं उन्हें मना लें सलीके से,
चलो मनाएं होली अब नए तरीके से।
— मिताली ममता शर्मा


