एन0के0शर्मा
नोएडा स्थित Birla Institute of Technology, Mesra परिसर में आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन इनोवेशन इन इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट (ICIEM-2026) का उद्घाटन सत्र आज दोपहर सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। लगभग दो घंटे तक चले इस सत्र ने तकनीक, प्रबंधन और सतत विकास के जटिल प्रश्नों को एक साझा मंच पर लाकर गहन विचार-विमर्श का अवसर प्रदान किया।
कार्यक्रम की शुरुआत भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप दीप प्रज्ज्वलन एवं ईश्वरीय वंदना के साथ हुई, जिसने पूरे आयोजन को एक गरिमामय और आध्यात्मिक आधार प्रदान किया। यह दृश्य केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि यह संकेत भी था कि आधुनिक तकनीकी विमर्श में भी भारतीय मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना का स्थान बना हुआ है।
इसके पश्चात सम्मेलन के मुख्य विषय—“AI और अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियाँ: सतत डिजिटल भविष्य हेतु हरित नवाचार”—पर देश-विदेश से आए विद्वान वक्ताओं, शिक्षाविदों और उद्योग विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और उभरती तकनीकों का उपयोग केवल दक्षता बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय मूल्यों के साथ जोड़ना अनिवार्य है।
चर्चा के दौरान यह स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि आने वाले समय में “हरित नवाचार” केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बनने जा रहा है। ऊर्जा दक्षता, डेटा सेंटरों की बढ़ती खपत, और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दों पर भी गंभीरता से विचार किया गया। विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि यदि तकनीकी विकास को सततता के साथ नहीं जोड़ा गया, तो यह प्रगति स्वयं अपने लिए चुनौती बन सकती है।
सत्र का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि वक्ताओं ने AI के नैतिक पक्ष पर भी खुलकर चर्चा की। डेटा गोपनीयता, एल्गोरिद्मिक पक्षपात (bias), और रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे विषयों ने उपस्थित श्रोताओं को सोचने पर मजबूर किया। कई वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि तकनीक का विकास मानव-केंद्रित होना चाहिए, अन्यथा यह सामाजिक असंतुलन को और गहरा कर सकता है।
हालांकि, एक समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो यह भी प्रश्न उठता है कि क्या इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन अपने निष्कर्षों को वास्तविक नीति-निर्माण और जमीनी क्रियान्वयन तक पहुंचा पाते हैं? अक्सर विचारों का यह आदान-प्रदान कागज़ों और प्रस्तुतियों तक सीमित रह जाता है। ऐसे में ICIEM 2026 के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इन चर्चाओं को ठोस परिणामों में कैसे परिवर्तित करता है।
उद्घाटन सत्र के समापन के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि यह सम्मेलन केवल तकनीकी प्रगति का उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का एक अवसर भी है—जहां यह तय किया जा रहा है कि आने वाला डिजिटल युग किस प्रकार का होगा: केवल तेज़ और स्वचालित, या फिर संवेदनशील, संतुलित और टिकाऊ।
अंततः, ICIEM 2026 का यह प्रारंभिक सत्र एक मजबूत बौद्धिक आधार स्थापित करने में सफल रहा है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आगामी सत्रों में यह विमर्श किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या यह वास्तव में एक “सतत डिजिटल भविष्य” की ओर ठोस कदम बन पाता है।


