Mediasamvad24

32.1 C
Noida
Sunday, August 30, 2026

Buy now

spot_img

युद्ध और तितली

(लघु कविता)

राजेन्द्र गायकवाड
बिलासपुर, छत्तीसगढ़

धुएं में घिरा है आसमान,
लड़ाकू विमानों की चीखें,
और बारूद से हलाकान जीव
जहाँ कभी हँसती थीं सुबह की किरणें और गाती थी हर शाम,
वहाँ अब सिर्फ़ धुआँ और टूटे हुए हैं,आलीशान मकान
फिर भी एक तितली के
लाल-नारंगी पंखों मे
शांति का रंग बचा हुआ है।
मानो युद्ध जैसा कुछ न हो।
पंख धीरे-धीरे हिलाती है,
जमीं पर बिखरे खून के ऊपर,
एक नन्हा सा इशारा छोड़ गई,
कि जीवन अभी उड़ सकता है,
भले ही सारी हवा में
तैरती मौत की गंध हो।
तितली ने न कोई नारा लगाया,
न कोई बम गिराया,
बस उड़ती है,थोड़ा सा रंग, थोड़ी सी हलचल,
थोड़ा सा लेकर संदेश
कि युद्ध के बाद भी
सुबह फिर हो सकती है।
बशर्ते लम्पट आदमी ,
अपनी आदमियत न छोड़े।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles