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सुरों की मलिका आशा भोसले: वह सुमधुर आवाज़ जो कभी मौन नहीं होगी…

(अंजनी सक्सेना -विभूति फीचर्स)

भारतीय संगीत के विशाल आकाश में कुछ सितारे ऐसे होते हैं, जिनकी रोशनी समय के पार चली जाती है। आशा भोसले उन्हीं में से एक थीं। उनका जाना केवल एक महान गायिका का निधन नहीं,उस युग का भी विराम है, जिसने सुरों को सिर्फ सुना नहीं, जिया था। आशाजी भारतीय संगीत के स्वर्णिम युग की अंतिम प्रतिनिधि थीं।
जब यह खबर हमारे सामने है, तो मन मानने को तैयार नहीं होता क्योंकि कुछ आवाज़ें इतनी गहरी होती हैं कि वे हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। वे रेडियो से निकलकर घरों में बसती हैं, यादों में घुलती हैं, और अनजाने में हमारी अपनी कहानी बन जाती हैं। वे भारतीय फिल्म संगीत जगत में बहुमुखी प्रतिभा की धनी गायिका थी। अपने फिल्मी जीवन के शुरुआती दौर में आशा जी को लता जी की कॉपी ही माना जाता था लेकिन आगे चलकर उन्होंने अपनी स्वयं की प्रतिभा के दम पर अपनी एक ऐसी शैली विकसित की जिसे आज तक कोई और दोहरा भी नहीं सका। आशा जी की गायन शैली पूरी फिल्म इंडस्ट्री में अनूठी और अनोखी रही लेकिन अब यह जादुई आवाज मौन हो गयी है।
दशकों बाद आज भी जब पिया तू अब तो आजा की धुन बजती है, तो सिर्फ एक गाना नहीं बजता। पूरा दौर जीवित हो उठता है। उस एक पुकार “मोनिका… ओ माय डार्लिंग!”…में जो नटखटपन, जो ऊर्जा, जो जीवन था, वही आशा भोसले की असली पहचान थी लेकिन उन्हें सिर्फ इसी एक रंग में सीमित कर देना उनके साथ अन्याय ही है।
दम मारो दम… में उनकी आवाज़ विद्रोह बन जाती है तो चुरा लिया है तुमने जो दिल को… में वही आवाज़ मासूम मोहब्बत बन जाती है। दिल चीज़ क्या है…और इन आंखों की मस्ती में… उनकी गायकी शायरी बनकर दिल में उतरती है तो ये मेरा दिल में… वही आवाज़ ग्लैमर और आकर्षण की परिभाषा लिखती है।
मेरा कुछ सामान सुनते ही एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है तो आओ हुजूर तुमको…में वही आवाज़ जिंदगी को हल्के-फुल्के अंदाज़ में जीना सिखाती है। “ओ हसीना जुल्फों वाली”, “जरा सा झूम लूं मैं”,” रंगीला रे”, “आज जाने की ज़िद न करो”, “ये क्या जगह है दोस्तों”, “राधा कैसे न जले” , ये सिर्फ गीत नहीं हैं, ये भावनाओं का एक पूरा ब्रह्मांड हैं । जिसे आशा भोसले ने अपनी दिलकश और बिंदास आवाज़ से रचा था।
आशा भोसले की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे हर गाने में एक किरदार बन जाती थीं। आर. डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और हेलेन के लिए उनकी आवाज़ ने स्क्रीन पर जादू रचा। ये ऐसा जादू था जिसमें आवाज़ और चेहरा एक हो जाते थे।
1933 में जन्मी आशा भोसले का जीवन आसान नहीं था। पिता के निधन के बाद कम उम्र में ही जिम्मेदारियां आ गईं। लता मंगेशकर जैसी महान बहन की छाया में अपनी अलग पहचान बनाना किसी चुनौती से कम नहीं था। शुरुआत में उन्हें वे गाने मिलते थे, जिन्हें दूसरे कलाकार ठुकरा देते थे लेकिन आगे चलकर यही उनकी ताकत बनी। उन्होंने हर “छोटे” मौके को इतना बड़ा बना दिया कि वही गीत उनकी पहचान बन गए।
समय बदला, संगीत बदला, लेकिन आशा भोसले नहीं बदलीं। वे हर बार खुद को बदल लेती थीं। 90 के दशक में रंगीला फ़िल्म में गाने गाकर उन्होंने साबित किया कि उम्र उनके लिए मायने नहीं रखती। नई पीढ़ी के साथ कदम मिलाना, नए प्रयोग करना, यह उनकी आदत थी, मजबूरी नहीं। आशा भोसले सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, वे एक मजबूत महिला के रुप में भी बेमिसाल थीं। जीवन के उतार-चढ़ाव, निजी संघर्ष,इन सबका असर उनकी आवाज़ पर नहीं पड़ा बल्कि हर दर्द, हर अनुभव उनकी गायकी को और गहरा करता गया।
आज जब वे नहीं हैं, तो लगता है जैसे संगीत में एक खालीपन आ गया है। रेडियो पर वही गाने बजेंगे, प्लेलिस्ट में वही धुनें होंगी। लेकिन यह एहसास हमेशा रहेगा कि जिस आवाज़ ने इन्हें जन्म दिया, वह अब हमारे बीच नहीं है। कलाकार मरते नहीं, उनकी कला उन्हें अमर बना देती है। आशा भोसले भी कहीं नहीं गई हैं। वे हर उस गाने में हैं, जिसे हम सुनते हैं। हर उस याद में हैं, जिसे हम महसूस करते हैं। अब जब भी कोई गुनगुनाएगा
“पिया तू अब तो आजा…” या “चुरा लिया है तुमने…”
तो वह सिर्फ गीत नहीं होगा। वह एक पूरी जिंदगी की गूंज होगी।
आज शब्द कम पड़ रहे हैं, लेकिन भावनाएं नहीं। आशा ताई, आपने हमें सिखाया कि संगीत सिर्फ सुर नहीं होता। वह जिंदगी होता है। आपने हर एहसास को आवाज़ दी, हर पल को यादगार बनाया। आप नहीं हैं, लेकिन आपकी “आशा” हमेशा रहेगी, हर सुर में, हर दिल में, हर याद में।
आज अलविदा नहीं… सिर्फ अश्रुपूरित श्रद्धांजली और उनका वही सदाबहार गीत… अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं। (विभूति फीचर्स)

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