नई दिल्ली : मोदी सरकार ने बुधवार को आईडीबीआई बैंक में 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स लि. को बेचने को मंजूरी दे दी. आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने इस फैसले को मंजूरी प्रदान कर दी.
सरकार के इस फैसले से बैंक में 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी को 52,878.08 करोड़ रुपये में बेचने का रास्ता साफ हो गया है. इस हिस्सेदारी में भारत सरकार के पास 30.48 प्रतिशत और लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के पास मौजूद 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी शामिल है. बिक्री के बाद सरकार के पास आईडीबीआई में 15 प्रतिशत हिस्सेदारी रहेगी, जबकि एलआईसी के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी.
लेन देन दो चरणों वाली बोली प्रक्रिया के जरिए हुआ. इसमें रेगुलेटरी जांच और सुरक्षा मंजूरी शामिल है. आरबीआई ने संभावित खरीदारों का मूल्यांकन फिट एंड प्रॉपर मानदंडों के आधार पर किया. बोली लगाने वालों के आगे बढ़ने से पहले गृह मंत्रालय ने सुरक्षा मंजूरी प्रदान की. यह प्रक्रिया अक्टूबर 2022 में शुरू हुई थी. शुरुआत में पांच पार्टियों ने ईओआई (एक्सप्रेशन ऑफ इंटेरेस्ट) जमा की थी. इनमें से चार पात्रता मानदंडों के तहत योग्य पाई गईं. बाद में दो कंपनियों ने तकनीकी और वित्तीय बोलियां जमा कीं. अंतिम निर्णय विनिवेश पर सचिवों के कोर ग्रुप द्वारा मूल्यांकन और वैकल्पिक तंत्र की सिफारिशों पर विचार करने के बाद लिया गया. इस घोषणा के तुरंत बाद केंद्रीय वित्त मंत्री ने सीसीईए की मंजूरी का स्वागत किया और इसे भारत के बैंकिंग सुधारों में एक मील का पत्थर बताया. उन्होंने कहा कि इस कदम से विदेशी निवेश आकर्षित होगा और बैंकिंग सेक्टर मजबूत होगा.
आईडीबीआई के प्रस्तावित स्ट्रैटेजिक रीस्ट्रक्चरिंग (रणनीतिक पुनर्गठन) के बारे में और बात करते हुए सूत्रों ने ईटीवी भारत को बताया कि यह कदम बैंक की फाइनेंशियल हालत में आए बड़े सुधार के बाद उठाया जा रहा है. हाालंकि, बैंक ने हाल के दिनों में अपने बैड लोन को काफी कम किया है और इसने अपनी कैपिटल की स्थिति को भी मजूबत किया. धीरे-धीरे ही सही लेकिन बैंक प्रोफिट की ओर बढ़ने लगा.
अधिकारी ने बताया कि इस रीस्ट्रक्चरिंग से ओनरशिप का नया स्ट्रक्चर बनेगा, लेकिन बैंक आरबीआई की रेगुलेटरी निगरानी में ही रहेगा. साथ ही, मौजूदा बैंकिंग सर्विस, डिपॉजिट प्रोटेक्शन और प्रायोरिटी-सेक्टर से जुड़ी जिम्मेदारियां भी बिना किसी बदलाव के जारी रहेंगी.
सूत्रों ने बताया कि इस कदम से बैंकिंग सेक्टर में सरकारी कंट्रोल कम करने पर लंबे समय से चल रही बहस भी फिर से शुरू हो गई है. अलग-अलग सरकारों के दौरान बने कई रिफॉर्म पैनल ने इस विचार का समर्थन किया है. सरकार का तर्क है कि रीस्ट्रक्चरिंग कई सालों तक बैलेंस शीट को ठीक करने के बाद की जा रही है. इससे पहले, बड़े कॉर्पोरेट लोन के कारण आईडीबीआई पर बैड लोन का बोझ बढ़ गया था. पब्लिक सेक्टर के बैंक सरकार के मालिकाना हक में ही बने रहेंगे, लेकिन इस प्रस्तावित बदलाव का मकसद प्राइवेट और विदेशी बैंकिंग एक्सपर्टाइज को लाना, कॉम्पिटिशन बढ़ाना और ऐसे बैंक से वैल्यू निकालना है जिसने काफी हद तक फाइनेंशियल रिकवरी कर ली है.
अधिकारी के अनुसार, सरकार ने 2010 से 2020 के बीच आईडीबीआई बैंक में ₹25,000 करोड़ लगाए हैं. इस पूंजी निवेश की वजह से बैंक का ग्रॉस एनपीए सितंबर 2018 में 31.78 प्रतिशत से घटकर मार्च 2026 में 2.32 प्रतिशत हो गया, जबकि इसी दौरान नेट एनपीए 17.30 प्रतिशत से घटकर 0.15 प्रतिशत रह गया.
बैंक का कैपिटल एडिक्वेसी रेश्यो भी 2018 में खराब स्थिति वाले 6.22 प्रतिशत से सुधरकर मार्च 2026 में 26.65 प्रतिशत हो गया. बैंक आरबीआई के ‘प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन’ फ्रेमवर्क से बाहर निकलकर FY26 में ₹9,513 करोड़ का रिकॉर्ड नेट प्रॉफिट दर्ज करने की स्थिति में आ गया है.
अधिकारी के अनुसार 30 सितंबर 2026 तक इसका कुल कारोबार ₹6,27,149 करोड़ के पार पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 18 फीसदी की बढ़ोतरी है. अधिकारी ने यह भी कहा कि रीस्ट्रक्चरिंग से ग्राहकों के लिए बैंक के कामकाज के मुख्य तरीकों में बदलाव की संभावना कम है. डिपॉजिट इंश्योरेंस और प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग की जरूरतें पहले की तरह ही बनी रहेंगी. आईडीबीआई फाइनेंशियल इन्क्लूजन, पेंशन और सोशल सिक्योरिटी स्कीमों के साथ-साथ माइक्रो और छोटे व्यवसायों को सपोर्ट करने में अपनी भूमिका निभाता रहेगा. साथ ही, मालिकाना हक में प्रस्तावित बदलाव से विदेशी बैंकिंग विशेषज्ञता आने, कॉम्पिटिशन मजबूत होने और लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट आकर्षित होने की उम्मीद है, जबकि अन्य पब्लिक सेक्टर बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी में कोई बदलाव नहीं होगा.
आंकड़ों के अनुसार, कई कमेटियों ने समय-समय पर पब्लिक सेक्टर बैंकों में सरकारी कंट्रोल कम करने की सिफारिश की, लेकिन मुख्य प्रस्ताव अधिकतर लागू नहीं हो पाए. 1998 में नरसिम्हन कमेटी ने नेशनलाइज्ड बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी घटाकर 33 प्रतिशत करने की बात कही थी, जबकि 2008 में रघुराम राजन कमेटी ने छोटे और खराब परफॉर्मेंस वाले पब्लिक सेक्टर बैंकों में स्ट्रैटेजिक इन्वेस्टर्स को लाने की सिफारिश की थी.
2009 में सरकार और आरबीआई की एक कमेटी ने सरकारी हिस्सेदारी को 51 प्रतिशत से कम करने की सिफारिश की थी. आईडीबीआई बैंक में प्रस्तावित रीस्ट्रक्चरिंग कई सालों के फाइनेंशियल दबाव और बैलेंस शीट में काफी सुधार के बाद हो रही है. बैंक के पास बड़े कॉर्पोरेट लोन थे जो बाद में बैड डेट्स में बदल गए, लेकिन तब से बैंक ने अपने नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स को काफी कम किया है, अपनी कैपिटल एडिक्वेसी को मजबूत किया है और रिकॉर्ड मुनाफा कमाया है. सरकार का मानना है कि मालिकाना हक में प्रस्तावित बदलाव बैंकिंग में प्राइवेट भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक नई पहल है और यह एक ऐसा सुधार है जिसकी सिफारिश कई कमेटियों ने समय-समय पर की थी.
आईडीबीआई के इस स्टेज तक पहुंचने में कौन-कौन से अहम पड़ाव आए, एक नजर
- मई 2017 – आरबीआई ने कैपिटल एडिक्वेसी, असेट क्वालिटी, रिटर्न ऑन असेट्स और डेट रेशियो के निर्धारित मानकों का उल्लंघन करने पर आईडीबीआई बैंक को प्रोम्पट कॉरेक्टिव एक्शन के दायरे में रखा. मार्च 2017 में एनपीए 13 प्रतिशत से अधिक थी.
- जनवरी 2019 – भारतीय जीवन बीमा निगम ने आईडीबीआई बैंक में 51 प्रतिशत नियंत्रक हिस्सेदारी हासिल की. इसके बाद आरबीआई ने रेगुलेटरी उद्देश्यों के लिए बैंक को निजी क्षेत्र के बैंक के रूप में वर्गीकृत किया.
- मार्च 2021 – आरबीआई ने वित्तीय प्रदर्शन में सुधार का हवाला देते हुए करीब चार साल बाद आईडीबीआई बैंक को प्रोम्पट कॉरेक्टिव एक्शन के दायरे से बाहर कर दिया.
- अप्रैल 2021 – एलआईसी ने सरकार की प्रस्तावित रणनीतिक विनिवेश योजना के साथ-साथ इक्विटी हिस्सेदारी घटाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी.
- मई 2021 – मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने आईडीबीआई बैंक में सरकार और एलआईसी की हिस्सेदारी की रणनीतिक बिक्री को मंजूरी दी. इसमें प्रबंधन नियंत्रण का हस्तांतरण भी शामिल था.
- अक्टूबर 2022 – सरकार ने आईडीबीआई बैंक में 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिए ईओआई आमंत्रित किए. इसमें सरकार की 30.48 प्रतिशत और एलआईसी की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी शामिल थी.
- जनवरी 2023 – सरकार को संभावित बोलीदाताओं से कई रुचि पत्र प्राप्त हुए.
- जुलाई 2024 – संभावित बोलीदाताओं को गृह मंत्रालय से आवश्यक सुरक्षा मंजूरी मिली और आरबीआई ने उनकी पात्रता एवं उपयुक्तता का आकलन किया.
- जनवरी 2026 – सरकार ने प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री के लिए वित्तीय बोलियां आमंत्रित कीं.
- फरवरी 2026 – सरकार को प्रेम वत्स के नेतृत्व वाली फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स और दुबई स्थित एमिरेट्स एनबीडी से वित्तीय बोलियां मिलीं.
- मार्च 2026 – वित्तीय बोलियां आरक्षित मूल्य से कम रहने के बाद सरकार ने बिक्री प्रक्रिया रोक दी.
- अप्रैल 2026 – सरकार ने विनिवेश प्रक्रिया दोबारा शुरू की और आगे की रणनीति के लिए तकनीकी मूल्यांकन किया.
- जुलाई 2026 – सरकार ने संशोधित वित्तीय बोलियां आमंत्रित कीं. इसके बाद फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स और एमिरेट्स एनबीडी से संशोधित प्रस्ताव मिले.
- अक्टूबर 2026 – मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक पुनर्गठन को मंजूरी दी. फेयरफैक्स 52,878 करोड़ रुपये में बैंक की 60.72 प्रतिशत नियंत्रक हिस्सेदारी का अधिग्रहण करेगी. हिस्सेदारी बिक्री के बाद केंद्र सरकार और एलआईसी के पास संयुक्त रूप से 34 प्रतिशत हिस्सेदारी रहेगी.


