Mediasamvad24

21.1 C
Noida
Saturday, October 17, 2026

Buy now

spot_img

हिमाचल में नए जिलों की सुगबुगाहट से गरमाई सियासत, सुक्खू सरकार के आयोग गठन के बाद चर्चाएं तेज

शिमला। हिमाचल प्रदेश में नए जिले बनाने की कवायद के साथ सियासत भी गरमा गई है। विधानसभा चुनाव में करीब 13 महीने का समय शेष है। राज्य की सुक्खू सरकार ने प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए आयोग गठित किया है। अब चर्चा इस बात पर है कि क्या प्रदेश को नए जिले मिलेंगे और यदि ऐसा हुआ तो किन क्षेत्रों की प्रशासनिक सीमाएं बदलेंगी।

सबसे बड़े जिले कांगड़ा और मंडी के संभावित पुनर्गठन से लेकर रामपुर, पालमपुर, नूरपुर, देहरा और सुंदरनगर को जिला बनाने की मांग तक, कई विकल्प राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय हैं। राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में इसको लेकर चर्चा हो चुकी है।

कांगड़ा बंटेगा या मंडी

हिमाचल में जिला गठन की मांग का इतिहास पुराना है। अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में नए जिले बनाने की संभावनाएं तलाशी गईं, लेकिन 1972 के बाद प्रदेश में कोई नया राजस्व जिला नहीं बना। सरकार ने आयोग बनाकर जिलों से लेकर उपमंडल, तहसील, उपतहसील और विकास खंडों तक की समीक्षा का रास्ता खोला है। सरकार व संगठन में चर्चा ये है कि कांगड़ा बंटेगा या मंडी।

राजनीतिक चर्चा इसलिए भी अहम है, क्योंकि हिमाचल में क्षेत्रीय संतुलन का चुनावी राजनीति से गहरा संबंध रहा है। कांगड़ा में 15 विधानसभा क्षेत्र हैं, जबकि मंडी में 10 और शिमला जिले में आठ विधानसभा क्षेत्र हैं। इन जिलों का प्रशासनिक आकार, भूगौलिक परिस्थितियां और राजनीतिक प्रतिनिधित्व अलग-अलग हैं। ऐसे में किसी भी बदलाव का असर स्थानीय प्रशासन के साथ क्षेत्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है।

हर सरकार में उठता रहा है जिला गठन का मुद्दा

नए जिले बनाने की मांग को लेकर हिमाचल की राजनीति में पहले भी कई बार हलचल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल में सुंदरनगर को जिला बनाने की मांग उठी थी। उस समय वहां अतिरिक्त उपायुक्त की तैनाती की गई थी।

बाद की सरकारों में भी नए जिलों की मांग उठती रही, लेकिन पूर्ण प्रशासनिक जिले बनाने पर सहमति नहीं बन सकी। अब आयोग के गठन के समय मिशन-2027 की तैयारियों में जुटी सुक्खू सरकार के फैसले को राजनीतिक नजरिये से भी देखा जा रहा है।

हालांकि, सरकार ने आयोग बनाने का उद्देश्य प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना बताया है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि समीक्षा के मानक जनता की सुविधा और प्रशासनिक जरूरतों पर केंद्रित रहते हैं या क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की मांगें भी निर्णय को प्रभावित करती हैं।

सुक्खू के संगठनात्मक प्रयोग से भी जुड़ा है मामला

मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, तब पार्टी में संगठनात्मक जिलों और ब्लाकों की संख्या बढ़ाने की कवायद शुरू हुई थी। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने संगठनात्मक जिलों के गठन का विरोध किया था। उनका मानना था कि संगठनात्मक स्तर पर अलग जिले बनाने से भविष्य में प्रशासनिक जिला बनाने की मांग को बल मिल सकता है।

वर्तमान में कांग्रेस में शिमला शहरी और शिमला ग्रामीण के लिए अलग-अलग जिला अध्यक्ष हैं। भाजपा ने भी अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करते हुए पांच अतिरिक्त संगठनात्मक जिले बनाए हैं।

इस तरह दोनों प्रमुख दलों के संगठनात्मक ढांचे में बड़े भौगोलिक क्षेत्रों को अलग-अलग इकाइयों में बांटने का प्रयोग हो चुका है। नए जिले बनाने के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क जनता की सुविधा का है। दूरदराज के क्षेत्रों के लोगों को उपायुक्त कार्यालय और अन्य जिला स्तरीय अधिकारियों तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

मई महीने में कैबिनेट ने दी थी मंजूरी

मई महीने में आयोजित कैबिनेट में इसकी चर्चा हुई थी। सरकार ने इसकी मंजूरी दी थी। अब सरकार ने इसके लिए आयोग गठित किया है।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles