Mediasamvad24

33.2 C
Noida
Sunday, August 30, 2026

Buy now

spot_img

जल का भू-राजनीतिक विस्फोट: क्या 21वीं सदी की निर्णायक लड़ाई सीमाओं पर नहीं, नदियों पर होगी?

एन0के0शर्मा
इक्कीसवीं सदी की शुरुआत तेल, गैस और परमाणु शक्ति की प्रतिस्पर्धा से हुई थी, किंतु तीसरे दशक में प्रवेश करते-करते विश्व राजनीति का केंद्र बिंदु चुपचाप बदल रहा है। अब संघर्ष का असली आधार ऊर्जा नहीं, बल्कि जल बनता जा रहा है—वह संसाधन जिसके बिना न अर्थव्यवस्था चल सकती है, न कृषि, न उद्योग और न ही सभ्यता। पृथ्वी की सतह का अधिकांश भाग जल से ढका है, परंतु पीने योग्य मीठा जल सीमित है, और उसी सीमित स्रोत पर जनसंख्या, औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तन का संयुक्त दबाव एक विस्फोटक स्थिति निर्मित कर रहा है। प्रश्न यह नहीं कि जल संकट है या नहीं; प्रश्न यह है कि जब यह संकट भू-राजनीतिक रूप ले लेगा, तब उसका स्वरूप कितना उग्र होगा।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनियाँ अब केवल पर्यावरणीय रिपोर्ट नहीं रहीं। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों ने बार-बार संकेत दिया है कि जल-अभाव भविष्य में बड़े पैमाने पर विस्थापन, अकाल और सामाजिक अस्थिरता का कारण बन सकता है। परंतु अंतरराष्ट्रीय मंचों की चेतावनियाँ तब ठोस राजनीतिक प्रश्न बन जाती हैं जब नदियाँ सीमाएँ पार करती हैं और स्रोत किसी एक राष्ट्र के नियंत्रण में होते हैं, जबकि निर्भरता अनेक राष्ट्रों की होती है। यही वह बिंदु है जहाँ जल संसाधन कूटनीतिक उपकरण से सामरिक दबाव में परिवर्तित हो जाता है।
दक्षिण एशिया इसका जीवंत उदाहरण है। हिमालयी नदियाँ करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं। यदि ऊपरी धारा वाले देश जल प्रवाह को नियंत्रित करते हैं, बाँधों की श्रृंखला बनाते हैं या जल का मोड़ बदलते हैं, तो निचली धारा वाले राष्ट्रों के कृषि-चक्र, ऊर्जा उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। जल समझौते दशकों तक शांति का आधार बने रह सकते हैं, किंतु बदलते राजनीतिक समीकरण उन्हें संशय के घेरे में ला सकते हैं। जब जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनद पिघलने की गति अनिश्चित हो और मानसून चक्र अस्थिर हो, तब हर नया बाँध संभावित तनाव का स्रोत बन जाता है।
अफ्रीका में नील नदी को लेकर वर्षों से चली आ रही खींचतान यह दर्शाती है कि ऐतिहासिक संधियाँ वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के सामने टिक नहीं पातीं। जब कोई उभरती हुई अर्थव्यवस्था अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए विशाल बाँध बनाती है, तो पारंपरिक रूप से निर्भर राष्ट्र इसे अस्तित्वगत चुनौती के रूप में देखते हैं। जल का प्रश्न यहाँ केवल विकास बनाम परंपरा का नहीं, बल्कि जीवन बनाम वर्चस्व का बन जाता है। यही कारण है कि जल-साझेदारी वार्ताएँ अब रक्षा और विदेश नीति के उच्चतम स्तर पर तय होती हैं।
मध्य पूर्व में स्थिति और भी संवेदनशील है। शुष्क जलवायु, सीमित वर्षा और भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन ने कई देशों को आयातित जल-प्रौद्योगिकी और विलवणीकरण संयंत्रों पर निर्भर बना दिया है। परंतु हर राष्ट्र के पास समान संसाधन नहीं हैं। जब कृषि योग्य भूमि सिकुड़ती है और जल स्रोत घटते हैं, तो खाद्य सुरक्षा संकट में आती है। खाद्य संकट सामाजिक असंतोष को जन्म देता है, और सामाजिक असंतोष राजनीतिक अस्थिरता को। इस क्रम में जल एक मौन उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है—जो सीधे गोली नहीं चलाता, परंतु संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को कई गुना बढ़ा दिया है। अनियमित वर्षा, लम्बे सूखे और अचानक बाढ़—ये सभी संकेत देते हैं कि प्राकृतिक जल चक्र असंतुलित हो चुका है। औद्योगिक विकास और कार्बन उत्सर्जन के लिए ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्रों और जल संकट का अधिक भार झेलने वाले विकासशील देशों के बीच एक नैतिक-राजनीतिक विमर्श उभर रहा है। क्या जल संकट की कीमत वही राष्ट्र चुकाएँ जो ऐतिहासिक रूप से कम उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं? यह प्रश्न पर्यावरणीय न्याय से आगे बढ़कर वैश्विक उत्तर-दक्षिण संबंधों का नया अध्याय लिख सकता है।
जल का निजीकरण एक और जटिल परत जोड़ता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जल वितरण और प्रबंधन के अनुबंध प्राप्त कर रही हैं। तर्क यह दिया जाता है कि निजी दक्षता से संसाधन प्रबंधन बेहतर होगा। किंतु आलोचकों का मत है कि जब जल को बाजार की वस्तु में बदला जाता है, तब उसकी उपलब्धता क्रय-शक्ति पर निर्भर हो जाती है। इससे सामाजिक असमानता और गहरी हो सकती है। यदि किसी शहर में पेयजल का अधिकार आर्थिक क्षमता पर निर्भर हो, तो यह लोकतांत्रिक संवैधानिक मूल्यों के विपरीत एक खतरनाक प्रवृत्ति होगी।
सैन्य रणनीतियों में भी जल का महत्व बढ़ रहा है। रणनीतिक बाँध, जलाशय और नहरें अब संवेदनशील ढाँचागत परिसंपत्तियाँ मानी जाती हैं। युद्धकाल में इन पर आक्रमण पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को पंगु बना सकता है। साइबर हमलों के माध्यम से जल आपूर्ति प्रणालियों को बाधित करने की आशंकाएँ भी बढ़ी हैं। इस प्रकार जल केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि साइबर-सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय भी बन चुका है।
फिर भी यह परिदृश्य अनिवार्य युद्ध की भविष्यवाणी नहीं करता। इतिहास यह भी बताता है कि साझा जल स्रोत सहयोग का आधार बन सकते हैं। अनेक नदी घाटी प्राधिकरणों और क्षेत्रीय समझौतों ने दशकों तक शांति बनाए रखी है। अंतरराष्ट्रीय कानून और मध्यस्थता तंत्र अभी भी सक्रिय हैं। परंतु इन संस्थाओं की प्रभावशीलता राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है। यदि राष्ट्र जल को शून्य-योग (zero-sum) संसाधन मानेंगे, तो संघर्ष की संभावना बढ़ेगी; यदि वे इसे साझा अस्तित्व का आधार मानेंगे, तो सहयोग का मार्ग खुलेगा।
इक्कीसवीं सदी की निर्णायक लड़ाई वास्तव में सीमाओं पर नहीं, बल्कि संसाधनों की नैतिक और न्यायपूर्ण साझेदारी पर होगी। जल संकट यह सिद्ध कर रहा है कि प्रकृति के संसाधन असीमित नहीं हैं, और उनका प्रबंधन केवल तकनीकी समाधान से संभव नहीं। इसके लिए पारदर्शी शासन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय विश्वास की आवश्यकता है। यदि जल को शक्ति-प्रदर्शन का औजार बनाया गया, तो यह मानव इतिहास के सबसे व्यापक संघर्षों का कारण बन सकता है। परंतु यदि इसे साझा उत्तरदायित्व के रूप में स्वीकार किया गया, तो यही संसाधन वैश्विक सहयोग का नया अध्याय भी लिख सकता है।
इसलिए प्रश्न केवल इतना नहीं कि भविष्य का युद्ध पानी पर होगा या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या मानवता समय रहते जल को युद्ध का कारण बनने से रोक पाएगी। नदियाँ सीमाएँ नहीं जानतीं; वे केवल प्रवाह जानती हैं। यदि राजनीति उस प्रवाह को रोकने का प्रयास करेगी, तो विस्फोट अवश्यंभावी होगा। परंतु यदि वह प्रवाह को साझा जीवनधारा मान ले, तो संभव है कि इक्कीसवीं सदी का इतिहास विनाश नहीं, बल्कि सहयोग के नए प्रतिमान के रूप में लिखा जाए।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles