वी पी एस खुराना
मथुरा जनपद से कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाथी की चाल ही सत्ता की दिशा तय करती थी। नीला गमछा गले में डालते ही गली-गली में नेता तैयार हो जाते थे। उस दौर में बहुजन समाज पार्टी केवल एक पार्टी नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुकी थी। उसी दौर की देन हैं मथुरा में बने अंबेडकर पार्क, अंबेडकर भवन और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के नाम पर खड़े स्मारक, जो आज भी उस राजनीतिक प्रभाव की गवाही देते हैं।
लेकिन राजनीति की बिसात पर समय के साथ मोहरे बदलते हैं और कभी-कभी चालें भी उलटी पड़ जाती हैं। मथुरा में बसपा की हालत कुछ ऐसी ही दिखाई देती है—वोटर मौजूद है, पर भरोसे का नेता गायब है।
समस्या की जड़ में एक पुरानी राजनीतिक बीमारी दिखाई देती है—“उधारी के नेता”।
बसपा ने वर्षों तक स्थानीय कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने के बजाय ऐसे चेहरों पर भरोसा किया जो राजनीतिक रूप से कहीं और से आए थे या हवा का रुख देखकर पार्टी में शामिल हुए थे।
लोकसभा चुनाव के समय भी पार्टी ने उधार के नेताओं पर दांव खेला, कभी सुरेश जैसे चेहरे सामने आए, कभी एस.के. गौतम जैसे नेताओं पर भरोसा जताया गया। पार्टी का सिंबल तो मिल गया, लेकिन संगठन की जड़ें उतनी मजबूत नहीं बन पाईं। नतीजा यह हुआ कि जब राजनीतिक हवा बदली तो कई चेहरे उसी हवा के साथ मुड़ भी गए।
यही वजह है कि आज मथुरा में बसपा का कोर वोटर तो मौजूद है, लेकिन उसके सामने ऐसा कोई मजबूत चेहरा नहीं है जिस पर वह भरोसा कर सके। संगठन चलता जरूर है, बैठकें भी होती हैं, लेकिन नेतृत्व की कमी साफ दिखाई देती है।
राजनीति का एक सिद्धांत है—
नेता पार्टी नहीं बनाती, नेता जनता बनाती है।
पार्टी केवल मुद्दे देती है, जमीन पर उसे ताकत जनता और कार्यकर्ता देते हैं।
मथुरा में बसपा की मुश्किल यही है कि संगठन के पास मुद्दों की धार भी कमजोर होती दिख रही है। उदाहरण के तौर पर राया क्षेत्र में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा खंडित होने का मामला उठा था। उस समय कुछ दिनों के लिए माहौल गरमाया, बयानबाजी हुई, बड़े-बड़े आश्वासन दिए गए। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, मुद्दे की हवा भी निकल गई।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि स्थानीय नेताओं और अधिकारियों के बीच बने समीकरणों ने उस आंदोलन की धार कुंद कर दी। परिणाम यह हुआ कि जो मुद्दा संगठन को नई ऊर्जा दे सकता था, वही धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया। उस समय किए गए कई वादे आज भी अधूरे पड़े हैं।
आज मथुरा में स्थिति यह है कि हाथी का वोट बैंक तो मौजूद है, लेकिन सवारी करने वाला मजबूत नेता नहीं दिखता।
वोटर भी असमंजस में है—वह किस चेहरे को अपना प्रतिनिधि माने?
व्यंग्य यही कहता है कि राजनीति में उधार के नेता कभी स्थायी पूंजी नहीं बनते।
वे मौसम के साथ आते हैं और मौसम के साथ चले भी जाते हैं।
अगर बसपा को मथुरा में फिर से अपने पुराने प्रभाव की झलक देखनी है, तो उसे उधार की राजनीति से बाहर निकलकर जमीनी कार्यकर्ताओं से नेता तैयार करने होंगे और मुद्दों को धार देनी होगी।
वरना हालत यही रहेगी—
हाथी का झंडा तो लहराता रहेगा, मगर उसे दिशा देने वाला सवार कहीं नजर नहीं आएगा।


