वाराणसी: काशी को संतों की नगरी कहा जाता है, तभी तो तुलसी, कबीर समेत रविदास ने काशी को अपनी कर्मभूमि बनाया. संत रविदास का जयंती समारोह हर वर्ष माघ पूर्णिमा के मौके पर मनाया जाता है और इस बार 1 फरवरी को यह खास दिन है.
काशी के लिए यह दिन और भी खास इसलिए है, क्योंकि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पिछले हिस्से में सीर गोवर्धन नामक जगह पर संत रविदास की जन्मस्थली मानी जाती है और संत रविदास की जयंती के मौके पर काशी का यह स्थान मिनी पंजाब की शक्ल लेने लगता है. जिसकी शुरुआत भी हो चुकी है.
15 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में पंजाब, हरियाणा सहित देश के अलग-अलग हिस्सों के अलावा विदेशों से भी बड़ी संख्या में संत रविदास को मानने वाले भक्त पहुंचते हैं. इस बार भी यहां 150 से ज्यादा अलग-अलग टेंट लोगों के रुकने के लिए लगए गए हैं. इसमें आधा दर्जन से ज्यादा लंगर लगे हैं. लोगों के खाने-पीने और अन्य व्यवस्थाओं के लिए पंजाब से आई संगत तैयारी में जुट गई हैं.
रविदासिया धर्म संगठन के प्रमुख संत निरंजन दास अपने एनआरआई भक्तों के साथ जालंधर से विशेष ट्रेन से रवाना हो चुके हैं और कल शुक्रवार दोपहर 2:00 बजे तक वह भी काशी पहुंच जाएंगे. इस तरह से काशी, आगामी 2 से 3 दिनों तक पंजाब की शक्ल लेकर एक अद्भुत संदेश के साथ संत रविदास के जन्म उत्सव में डूबी नजर आएगी.
इस बारे में गुरु संत रविदास जन्म स्थान ट्रस्ट के पब्लिक सेक्रेटरी नरेंद्र दास चीमा ने बताया कि हमारे लिए बहुत सौभाग्य की बात है कि काशी में हमारे गुरुओं ने संत रविदास के जन्म स्थान की खोज की. संत रविदास के जन्म स्थान के बाद यह 649 वीं जयंती उत्सव यहां मनाया जाएगा.
सबसे बड़ी बात यह है कि यह पवित्र स्थान अपने आप में बिल्कुल अनूठा है. इस मंदिर की स्थापना गुरुद्वारे की तरह ही की गई है. मंदिर के शीर्ष पर एक बड़ा गुंबद और छोटे-छोटे कल 31 गुंबद स्थापित किए गए हैं, जो सभी स्वर्ण मंडित हैं. मंदिर का गर्भगृह संत रविदास की तपस्या स्थली है, जहां पर उनकी प्रतिमा स्थापित है.
सबसे बड़ी बात यह है कि बनारस के सेट गोवर्धन में स्थापित संत रविदास मंदिर रविदासिया संप्रदाय के साथ अन्य संप्रदाय के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है.
इस मंदिर की वास्तु कला भी बिल्कुल गुरुद्वारे से प्रभावित होकर बनाई गई है. मंदिर के ट्रस्टी का कहना है कि संत रविदास की जयंती पर दुनिया भर के लोग यहां आते हैं. इस मंदिर की स्थापना का श्रेय स्वामी सरवन जी महाराज को जाता है. 14 जून 1965 को स्वामी हरिदास के द्वारा इस मंदिर की नींव रखवाई गई थी. स्वामी गरीबदास को इस मंदिर के निर्माण के जिम्मेदारी सौंपी गई थी. 22 फरवरी 1974 को आयोजित संत सम्मेलन में संत रविदास की मूर्ति स्थापित हुई. तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायण ने 1998 में गुरु रविदास द्वार का भी उद्घाटन किया था, जो इससे कुछ ही दूरी पर है.
संत रविदास का यह मंदिर धार्मिक आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है. धार्मिक आस्था का ही बल है, जो यहां हर वर्ष 15 लाख से भी ज्यादा लोग संत रविदास की जयंती मनाने के लिए पहुंचते हैं. इस बार भी यह संख्या लाखों में रहने की उम्मीद है.
मंदिर के ट्रस्टी का कहना है कि संत रविदास के पावन जयंती के मौके पर लगभग 1000 से ज्यादा एनआरआई आ रहे हैं. इसके साथ ही 5000 सेवादार पहुंच चुके हैं, जो सेवाओं में लगे हैं. प्रतिदिन यहां पर 5 लाख से ज्यादा लोगों को भोजन करने की अभी व्यवस्था है, जो कल तक नए लंगर शुरू होने के बाद सुबह शाम मिलकर 15 से 20 लाख हो जाएगी. अलग-अलग आधा दर्जन से ज्यादा लंगर का संचालन किया जाएगा. जिसमें दो प्रमुख लंगर मंदिर ट्रस्ट की तरफ से चलाए जाएंगे, जबकि बाकी पंजाब से आए भक्त अपने स्तर पर चलते हैं.
जानकारी के मुताबिक 100 ट्रक से ज्यादा खाद्य सामग्री अब तक यहां पहुंच चुकी है. जिसे स्टोर करके सुरक्षित रखा गया है. यहां पर दो दिवसीय मुख्य आयोजन भी होंगे. इसमें अनूप जलोटा भी इस बार भजन प्रस्तुति देंगे. इस वृहद आयोजन में इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई और वीआईपीज को भी निमंत्रण भेजा गया है, लेकिन अब तक किसी का कंफर्मेशन मंदिर ट्रस्ट को नहीं मिला है.
काशी के संत रविदास का धार्मिक महत्व बहुत बड़ा माना जाता है. यहां 65 वर्ष पुराना वह इमली का पेड़ भी मौजूद है. जिसे एक इमली की डंडी के जरिए संत रविदास ने गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद पर लगाया था.
इस पेड़ के पास बैठने और पूजापाठ करने वाले स्वामी हरदयाल सिंह का कहना है कि उस वक्त गुरु गोरक्षनाथ ने संत रविदास से बस इतना कहा था कि यहां पर तो कोई छांव की व्यवस्था नहीं है. जिसके बाद जब गुरु गोरक्षनाथ गंगा स्नान करके लौटे, तो एक छोटी सी इमली की डंडी, जिसे संत रविदास ने जमीन में गाड़ा, वह एक विशाल वृक्ष का रूप ले लिया और छांव भी हो गई. हर वर्ष इस पेड़ का दर्शन करने के लिए ही बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं.
- काशी में संत रविदास जन्म स्थल को गोल्डन टेंपल के नाम से भी जाना जाता है
- यहां पर मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार स्वर्ण मंदिर है
- 130 किलो सोने की पालकी यहां रखी हुई है
- इसे 2008 में यूरोप के भक्तों ने संगत कर पंजाब के जालंधर में बनवाया था. इसका अनावरण उसे वक्त बसपा सुप्रीमो मायावती ने 2008 में किया था
- इस पालकी को साल में एक बार जयंती के दिन ही निकाला जाता है
- इसके बाद 32 स्वर्ण कलश यहां मंदिर के शिखर पर 32 कलशों में स्थापित किए गए हैं
- 2012 में 35 किलोग्राम सोने का एक स्वर्ण दीपक यहां पर एक भक्त ने दान किया था, जो अनवरत यहां जलता है.
- इसके अतिरिक्त 35 किलोग्राम के सोने का एक छत्र भी यहां लगा है
कुल मिलाकर इस मंदिर में मौजूदा समय में 200 किलोग्राम से भी ज्यादा सोना मौजूद है, जो यहां दान के जरिए आया है.
काशी का रविदास मंदिर एक तरफ जहां धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, तो वहीं राजनीतिक दृष्टि से भी इसका जबरदस्त महत्व है. यही वजह है कि मायावती ने दलित वोट बैंक पर निशाना साधने के लिए संत रविदास जन्माष्टमी पर सुविधाओं का विस्तार किया. इस परंपरा को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी जारी रखा.
इसके पहले मुलायम सिंह यादव ने भी संत रविदास मंदिर के निर्माण और सुंदरीकरण पर अच्छा खासा बजट दिया था. यहां हर साल नेताओं का जमावड़ा लगता है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां दर्शन करने आए हैं और लंगर भी छका है.
इसके साथ ही गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी समेत आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी यहां आ चुके हैं. पंजाब के वोटर पर काशी से निशाना साधने के लिए यह बहुत बड़ा स्पॉट माना जाता है, इसलिए राजनीतिक पॉइंट ऑफ व्यू से इस मंदिर का अपना ही एक अलग महत्व है.
इस बारे में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हेमंत मालवीय का कहना है कि राजनीति में धार्मिक चीजों का महत्व बहुत ज्यादा होता है. वोट बैंक से लेकर डेवलपमेंट की योजनाओं तक धार्मिक महत्व और भी बढ़ गए हैं. आज से नहीं पहले से ही राजनीतिक दृष्टि से धार्मिक स्थान का इस्तेमाल वोटर को अपनी ओर खींचने के लिए किया जाता है. उनका कहना है कि काशी का रविदास मंदिर दलित वोट बैंक का बहुत बड़ा केंद्र है. यहां से सिर्फ पंजाब और हरियाणा नहीं, बल्कि यूपी के दलितों को भी एक बड़ा संदेश जाता है. इसलिए कोई भी राजनीतिक दल यहां पर चूकना नहीं चाहता और और अपनी मौजूदगी अपने-अपने तरीके से यहां दर्ज करवाता है.


