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Sunday, August 30, 2026

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गोरखपुर में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने शुरू की ‘गविष्टि यात्रा’, गो रक्षा पर योगी सरकार को घेरा

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से रविवार को गोविष्टि यात्रा का शुभारंभ हुआ. भारत माता मंदिर, सहारा स्टेट के सामने आयोजित कार्यक्रम में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज ने इस यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया. इस दौरान उन्होंने अपने संबोधन में न केवल धार्मिक मुद्दों को उठाया, बल्कि सरकार, राजनीति, वोट बैंक और सामाजिक मानसिकता पर भी तीखे सवाल खड़े किए. उनके भाषण में आक्रोश, आह्वान और आंदोलन की स्पष्ट झलक देखने को मिली.

धमकियों का दावा और निडरता का संदेश

शंकराचार्य ने अपने संबोधन की शुरुआत एक गंभीर आरोप से की. उन्होंने कहा कि गोविष्टि यात्रा शुरू करने से पहले उन्हें कई तरह की धमकियां मिलीं. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे किसी भी प्रकार के डर से पीछे हटने वाले नहीं हैं. उनका कहना था कि “किसी के माई के लाल में हिम्मत नहीं है कि हमें मरवा दे. अगर कोई पार्टी ऐसा करने की कोशिश करेगी, तो वह सत्ता से बेदखल हो जाएगी.”

उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें डराने का प्रयास इसलिए किया जा रहा है क्योंकि वे जनता की वास्तविक भावनाओं और मुद्दों को सामने ला रहे हैं. उनके अनुसार, गोरखपुर की जनता निडर है और वह सच्चाई के साथ खड़ी है, लेकिन कुछ शक्तियां इस आवाज को दबाना चाहती हैं.

गोविष्टि यात्रा का क्या है उद्देश्य

गोविष्टि यात्रा को लेकर उन्होंने बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य देश में गाय की रक्षा और उसके सम्मान को लेकर जनजागरण करना है. उन्होंने कहा कि गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का आधार है. “गाय को माता कहकर पुकारते हैं, लेकिन व्यवहार में उसके साथ वैसा सम्मान नहीं दिया जा रहा है,”.

उन्होंने जोर देकर कहा कि गाय के प्रति केवल भावनात्मक जुड़ाव पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी सुरक्षा और सम्मान के लिए ठोस कदम उठाने होंगे. इस यात्रा के माध्यम से वे गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करेंगे और गोरक्षा को जनआंदोलन बनाने की कोशिश करेंगे.

सरकार पर निशाना

अपने भाषण में शंकराचार्य ने केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधा. उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में हिंदू हितों की प्रतिनिधि होती, तो अब तक गोमाता की रक्षा के लिए ठोस और प्रभावी नीतियां लागू हो चुकी होतीं.

उन्होंने सवाल उठाया कि “अगर अन्य देशों में वहां के धार्मिक समुदायों की बात सुनी जाती है, तो भारत में गोमाता की रक्षा की मांग क्यों नहीं सुनी जाती?” उन्होंने यह भी कहा कि इससे यह संकेत मिलता है कि देश में न तो हिंदू राष्ट्र की अवधारणा लागू है और न ही सत्ता में बैठी पार्टी पूरी तरह हिंदू हितों के प्रति प्रतिबद्ध है.

मुख्यमंत्री पर भी बोला हमला

शंकराचार्य ने राज्य सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री गाय की रक्षा के मुद्दे पर अपेक्षित दृढ़ता नहीं दिखा पा रहे हैं. उनके अनुसार यदि नेतृत्व में साहस होता, तो बिना किसी दबाव के गोमाता को “राज्यमाता” घोषित किया जा सकता था.

उन्होंने कहा, “अगर मुख्यमंत्री में इच्छाशक्ति होती, तो वे केंद्र की परवाह किए बिना यह निर्णय ले सकते थे. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि वोट बैंक की राजनीति हावी है.” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार मुस्लिम और अन्य समुदायों के वोटों को खोने के डर से गोरक्षा जैसे मुद्दों पर सख्त निर्णय नहीं लेती.

लोकतंत्र और मतदान पर जोर

अपने संबोधन में उन्होंने लोकतंत्र की शक्ति और जनता की भूमिका पर भी विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि “सरकार हम हैं, जनता ही असली सत्ता है.” उन्होंने लोगों से अपील की कि वे मतदान के महत्व को समझें और अपने अधिकार का सही उपयोग करें.

उन्होंने कहा कि यदि जनता ठान ले, तो वह किसी भी मुद्दे को सरकार के एजेंडे में ला सकती है. “आप चाहेंगे कि गाय की रक्षा हो, तो होगी. आप चाहेंगे कि उसकी हत्या हो, तो वह भी होगा,”

धार्मिक और सांस्कृतिक तर्क

शंकराचार्य ने अपने भाषण में वेदों और धार्मिक ग्रंथों का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि प्राचीन शास्त्रों में गाय की रक्षा को धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है. उन्होंने एक वैदिक संदर्भ देते हुए कहा कि “गाय को मारने वाले असुरों का नाश किया गया था,” और आज भी उसी भावना के साथ समाज को खड़ा होना होगा.

उन्होंने यह भी कहा कि गोरक्षा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है. उनके अनुसार, गाय भारतीय समाज की आत्मा से जुड़ी हुई है और उसकी रक्षा करना हर नागरिक का दायित्व है.

वोट बैंक की राजनीति पर हमला

अपने संबोधन में उन्होंने वोट बैंक की राजनीति पर भी कड़ा प्रहार किया. उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल अपने निर्णय जनता के हित में नहीं, बल्कि चुनावी लाभ के आधार पर लेते हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ नेता खुले तौर पर यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें हर वर्ग का वोट चाहिए, चाहे वह गोरक्षा के खिलाफ ही क्यों न हो.

उन्होंने तीखे अंदाज में कहा, “क्या आप गाय का दूध और खून एक साथ मिलाकर पी सकते हैं? नहीं. फिर वोट की राजनीति में ऐसा क्यों किया जा रहा है?”

37 से ज्यादा कानून हिंदुओं के खिलाफ

शंकराचार्य ने यह भी आरोप लगाया कि देश में कई ऐसे कानून बनाए गए हैं जो हिंदू समाज के खिलाफ हैं. उन्होंने कहा कि मंदिरों को तोड़ा जा रहा है और धार्मिक प्रतीकों का अपमान हो रहा है. समाज में कई ऐसे बदलाव हो रहे हैं, जो पारंपरिक मूल्यों के खिलाफ हैं. हालांकि, उन्होंने इन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा नहीं की, लेकिन संकेतों में अपनी नाराजगी जरूर जताई.

“एक वोट, एक नोट” का आह्वान

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे गोरक्षा और धार्मिक स्थलों के विकास के लिए “एक वोट, एक नोट” का संकल्प लें. उन्होंने कहा कि हर विधानसभा क्षेत्र में गोरक्षा के लिए “रामाधाम” बनाए जाएंगे और इसके लिए जनसमर्थन जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में बूचड़खानों के खिलाफ आंदोलन तेज किया जाएगा और इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा.

81 दिन में 81 युद्ध की योजना

गोविष्टि यात्रा को लेकर उन्होंने एक बड़ी योजना का भी खुलासा किया. उन्होंने कहा कि 81 दिनों तक यह यात्रा चलेगी और इस दौरान 81 “युद्धों” यानी संघर्षों की चर्चा की जाएगी. इसका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना और एक बड़े जनआंदोलन की नींव रखना है.

चारों शंकराचार्यों की सामूहिक आवाज

कार्यक्रम में उठे एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया कि चारों शंकराचार्य मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं. हालांकि, क्षेत्रीय व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग शंकराचार्य नेतृत्व करते हैं. उन्होंने कहा, “यह मेरी अकेले की आवाज नहीं है. यह चारों शंकराचार्यों की आवाज है. मुझे केवल प्रवक्ता के रूप में आगे किया गया है.”

राजनीति से दूरी का दावा

अपने भाषण के अंत में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है. उन्होंने कहा कि शंकराचार्य किसी पार्टी के मोहताज नहीं हैं और उनका उद्देश्य केवल सनातन धर्म और समाज के हित में काम करना है. उन्होंने विश्वास जताया कि यदि वे कहीं भी पदयात्रा करेंगे, तो सनातन धर्म के अनुयायी उनका समर्थन करेंगे और उनके मार्ग में फूल बिछाएंगे.

गोरखपुर से शुरू हुई गोविष्टि यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी देती नजर आ रही है. शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के भाषण में जहां गोरक्षा का आह्वान था, वहीं सरकार और व्यवस्था के प्रति असंतोष भी साफ झलक रहा था. आने वाले दिनों में यह यात्रा किस दिशा में जाती है और इसका समाज व राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा.

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