मोहम्मद आलम
अयोध्या। जैसे ही माह-ए-मुबारक रमजान की आमद का एहसास हुआ, फिज़ा में एक अजीब सी रूहानियत घुल गई। गलियों में सुकून का अहसास है, दिलों में इबादत की ललक और आंखों में चांद के दीदार की बेसब्री साफ झलकती रही । यह सिर्फ एक महीना ही नहीं बल्कि शब्र, शुक्र और इंसानियत का पैगाम लेकर आने वाला वक्त है, जिसका इंतजार हर साल पूरे एहतिराम के साथ किया जाता है। नगर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक हर घर में तैयारी है कहीं सेहरी की चर्चा है, कहीं इफ्तार का फिक्र, तो कहीं तरावीह की नमाज के लिए मस्जिदों को सजाने-संवारने का सिलसिला जारी है।
रमजान की दस्तक के साथ ही शहर का मंजर बदला-बदला नजर आ रहा है। बाजारों में रौनक है, लेकिन उस रौनक में भी एक तहजीब और सादगी की झलक दिखाई देती है। फलों की दुकानों पर भीड़ है, खजूर की अलग-अलग किस्में सजी हैं, और सूखे मेवों की खुशबू माहौल में घुली हुई है। इफ्तार के लिए सेवइयां, शरबत और जरूरी सामान की खरीदारी जोरों पर है।
मस्जिदों में तरावीह की नमाज के लिए तैयारियां मुकम्मल हो चुकी हैं। सफाई, रोशनी और नमाजियों की सहूलियत के इंतजाम पूरे कर लिए गए हैं। जैसे-जैसे चांद नजर आने की घड़ी करीब आ रही है, वैसे-वैसे लोगों की बेताबी भी बढ़ती जा रही है।
नगर से लेकर गांवों तक रमजान की आमद ने न सिर्फ बाजारों को आबाद किया है, बल्कि दिलों को भी जोड़ने का काम किया है। हर चेहरा इबादत की चाहत और रहमत की उम्मीद से रोशन नजर आ रहा है। सच ही है रमजान सिर्फ एक महीना नहीं, बल्कि आत्मा को सुकून देने वाला एहसास है, जो पूरे शहर को एक डोर में बांध देता है।


