नई दिल्ली : असहमति जताने वाले कर्जदाताओं ने आरोप लगाया है कि मीडिया कारोबारी सुभाष चंद्रा के परिवार से जुड़ी पांच संस्थाओं के पास कर्जदाताओं की समिति में 61.78 प्रतिशत मतदान अधिकार थे और इन संस्थाओं ने उनकी व्यक्तिगत दिवाला समाधान योजना को मंजूरी दिलाने में अहम भूमिका निभाई.
चंद्रा की योजना में करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत कर्ज दावों के मुकाबले केवल 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान करने का प्रस्ताव है.
कर्जदाताओं ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में दलील दी कि ये पांच संस्थाएं चंद्रा की सहयोगी या संबंधित पक्ष हैं और इसलिए उन्हें योजना पर मतदान करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी.
एनसीएलटी के 144 पन्नों के आदेश के अनुसार, इन पांच संस्थाओं के मतों को शामिल किए जाने के बाद समाधान योजना को कर्जदाताओं की समिति में 80.814 प्रतिशत मतों से मंजूरी मिली। ये संस्थाएं वीणा इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड, डायरेक्ट मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड, वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स एलएलपी, लेमोनेड कैपिटल एडवाइजर्स एलएलपी और कॉर्पकॉल कैपिटल एडवाइजर्स एलएलपी हैं.
मामले की सुनवाई कर रही एनसीएलटी की दो सदस्यीय पीठ के न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी की राय अलग-अलग थी। इसके बाद मामला तीसरे सदस्य निलेश शर्मा के पास भेजा गया, जिन्होंने समाधान योजना के पक्ष में फैसला दिया.
एचडीएफसी बैंक और आईडीबीआई ट्रस्टीशिप सर्विसेज समेत असहमति जताने वाले कर्जदाताओं ने कहा कि इन पांच संस्थाओं को मतदान से बाहर रखा जाना चाहिए था। एचडीएफसी बैंक का कुल दावे में 3.2 प्रतिशत हिस्सा है.
बैंक ने कहा है कि वह एनसीएलटी के आदेश के खिलाफ अपील करने पर विचार कर रहा है.
केनरा बैंक ने भी कहा है कि वह एनसीएलटी के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) में अपील दाखिल कर रहा है.
केनरा बैंक ने एक बयान में कहा कि उसने 1.60 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी के साथ यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (0.76 प्रतिशत) और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (6.09 प्रतिशत) के साथ मिलकर सुभाष चंद्रा की 6.25 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना का विरोध किया और उसके खिलाफ मतदान किया.
हालांकि, अन्य कर्जदाताओं ने 80.81 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी के बहुमत से पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दे दी.
केनरा बैंक ने मामले में फॉरेंसिक ऑडिट की मांग भी की थी, लेकिन उसकी अल्पमत मतदान हिस्सेदारी के कारण यह मांग स्वीकार नहीं की जा सकी.
तीसरे सदस्य निलेश शर्मा के समाधान योजना के पक्ष में फैसला देने के बाद, योजना के तहत चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में कर्जदाताओं के करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के निपटारे के लिए केवल 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा.
उल्लेखनीय है कि दो सदस्यीय पीठ की तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी ने योजना पर सहमति नहीं जताई थी। उन्होंने समाधान पेशेवर (आरपी) के कामकाज पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसने आईबीसी की धारा 106(4) और अन्य प्रावधानों का उल्लंघन किया।
उन्होंने पुनर्भुगतान योजना में गंभीर प्रक्रियागत अनियमितताओं की ओर भी ध्यान दिलाया और समाधान पेशेवर के आचरण पर चिंता जताई.
हालांकि, चंद्रा ने बृहस्पतिवार को जारी एक बयान में कहा कि व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही में उनके खिलाफ कुल दावा केवल 3,992 करोड़ रुपये का है.
उन्होंने कहा कि इन मामलों में वह केवल व्यक्तिगत गारंटर थे, कर्जदार नहीं। उन्होंने 22,000 करोड़ रुपये के दावे को खारिज किया.
तीसरे सदस्य द्वारा पारित आदेश में असहमति जताने वाले कर्जदाताओं की दलील भी दर्ज है। इसमें कहा गया है कि वीणा इन्वेस्टमेंट्स का नियंत्रण सुषिला देवी गोयल के पास बताया जाता है, जो सुभाष चंद्रा के भाई जवाहर गोयल की पत्नी हैं। वहीं, डायरेक्ट मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन वेंचर्स और वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स इसकी अनुषंगी कंपनियां हैं.
इन संस्थाओं के सुभाष चंद्रा के खिलाफ दावे क्षतिपूर्ति पत्रों और गारंटी दस्तावेजों पर आधारित थे, जो कथित तौर पर चंद्रा ने उनके पक्ष में जारी किए थे। ये दस्तावेज इंडसइंड बैंक द्वारा समूह की एक अन्य कंपनी स्पिरिट टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड को दी गई ऋण सुविधाओं से जुड़े गिरवी रखे गए समूह के शेयरों से संबंधित थे.
इसके अलावा, एनसीएलटी के आदेश में कहा गया है कि लेमोनेड कैपिटल एडवाइजर्स एलएलपी और कॉर्पकॉल कैपिटल एडवाइजर्स एलएलपी के दावे कथित तौर पर व्यक्तिगत गारंटर सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई गारंटी पर आधारित हैं। ये गारंटी समूह की एक अन्य कंपनी चूरू एंटरप्राइजेज एलएलपी द्वारा ली गई वित्तीय सुविधाओं के संबंध में दी गई थीं.
आदेश में यह भी दर्ज है कि इन संस्थाओं और व्यक्तिगत गारंटर सुभाष चंद्रा के बीच नजदीकी संबंध की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि इन दोनों संस्थाओं के साझेदार उन कंपनियों के निदेशक भी हैं, जिन्हें वित्त वर्ष 2020-21 के लिए वीणा इन्वेस्टमेंट्स के एकीकृत वित्तीय विवरणों में ‘अन्य संबंधित पक्ष’ के रूप में बताया गया है.
एनसीएलटी के आदेश के अनुसार, असहमति जताने वाले कर्जदाताओं में से एक ने आरोप लगाया कि समाधान पेशेवर ने व्यक्तिगत गारंटर सुभाष चंद्रा से जुड़ी इन पांच संस्थाओं के दावों को गलत तरीके से स्वीकार किया। इन संस्थाओं के पास कर्जदाताओं की समिति में कुल करीब 61.78 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी थी और उन्होंने पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
दलील दी गई कि आईबीसी की धारा 79(2), 5(24ए) और 109(4)(बी) के तहत ये संस्थाएं सुभाष चंद्रा की ‘सहयोगी’ और ‘संबंधित पक्ष’ थीं। इसलिए उन्हें कर्जदाताओं की समिति में मतदान करने के लिए अयोग्य माना जाना चाहिए था.
असहमति जताने वाले कर्जदाताओं ने आगे दलील दी कि इन पांचों संस्थाओं के दावों से जुड़ी गारंटी अंतरिम रोक लागू होने के बाद ही भुनाई गई थीं। उनके अनुसार, इस वजह से गारंटी भुनाने की कार्रवाई कानूनी रूप से अमान्य हो जाती है.
उन्होंने यह भी कहा कि इन संस्थाओं ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में दाखिल अपने वित्तीय विवरणों में सुभाष चंद्रा से मिलने वाली किसी देनदारी का उल्लेख नहीं किया था। कर्जदाताओं के अनुसार, ये बातें मिलीभगत से कृत्रिम रूप से कर्ज तैयार किए जाने की ओर इशारा करती हैं.
हालांकि, एनसीएलटी के तीसरे सदस्य और न्यायिक सदस्य निलेश शर्मा ने इन दलीलों को खारिज कर दिया.
उन्होंने कहा कि किसी संस्था को ‘सहयोगी’ तभी माना जा सकता है, जब कर्जदार के पास उस संस्था की 51 प्रतिशत या उससे अधिक शेयर पूंजी हो या वह सीधे उसके निदेशक मंडल को नियंत्रित करता हो.
एनसीएलटी ने अपने आदेश में कहा कि यह भी दलील दी गई कि समाधान पेशेवर ने योजना को मंजूरी के लिए रखने से पहले कुछ कर्जदाताओं के दावों और उनके मतदान अधिकारों की उचित तरीके से जांच नहीं की। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने पूरी मंजूरी प्रक्रिया पर दोबारा विचार करने की मांग की.
आरबीएल बैंक ने भी असहमति जताने वाले दोनों कर्जदाताओं की ओर से उठाए गए मुद्दों का काफी हद तक समर्थन किया। बैंक ने पुनर्भुगतान योजना की निष्पक्षता और व्यवहार्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह वास्तविक कर्जदाताओं के हितों के प्रतिकूल है.
इंडसइंड बैंक ने समाधान पेशेवर द्वारा मतदान हिस्सेदारी की गणना के तरीके पर आपत्ति जताई। बैंक ने पुनर्भुगतान योजना की व्यावसायिक व्यवहार्यता, निष्पक्षता और पर्याप्तता पर भी सवाल उठाए.
खास तौर पर बैंक ने योजना के तहत प्रस्तावित भुगतान और व्यक्तिगत गारंटर/कर्जदार की वित्तीय स्थिति तथा संपत्तियों के मूल्य के बीच कथित अंतर को लेकर चिंता जताई.
मामला अब बहुमत की राय के अनुरूप औपचारिक आदेश पारित करने के लिए मूल दो सदस्यीय पीठ के पास वापस जाएगा। यह प्रक्रिया कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 419(5) के तहत जरूरी है.


