नोएडा: उत्तर प्रदेश के नोएडा सेक्टर-150 में युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत के मामले ने हड़कंप मचा दिया है। एक तरफ एसआईटी हादसे के बाद के शुरुआती दो घंटे में हुई कथित लापरवाही की जांच कर रही है। वहीं, दूसरी तरफ स्पोर्ट्स सिटी परियोजना से जुड़ा पुराना जमीन विवाद और अनियमितताएं भी एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं। पुलिस जांच में सामने आया है कि जिस भूखंड को लेकर विवाद है, वह वर्ष 2014 में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने खरीदा था। इसके बाद वर्ष 2020 में यह जमीन एमजेड विजटाउन ने खरीद ली, लेकिन अब भी इसमें लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन की हिस्सेदारी बनी हुई है। इसके कई खरीदारों के नाम सामने आए हैं।
अभय कुमार के पास 32 फीसदी शेयर
कंपनी की शेयर होल्डिंग के मुताबिक, अभय कुमार के पास 32.2 फीसदी, संजय कुमार के पास 27.3 फीसदी, मनीष कुमार के पास 7 फीसदी, अचल बोहरा के पास 3.05 फीसदी और निर्मल सहित लोटस ग्रीन की कुल 30 फीसदी हिस्सेदारी है। जमीन के कई हिस्सेदार होने के कारण जिम्मेदारी तय करना जांच एजेंसियों के लिए चुनौती बन गया है। इस मामले के खुलासे के बाद योजना में लापरवाही को लेकर चर्चा तेज है।
नियमों की अनदेखी का आरोप
नोएडा सेक्टर-78, 79, 150 और 152 में स्पोर्ट्स सिटी के लिए वर्ष 2009-10 से वर्ष 2014-15 के बीच चार प्लॉट का आवंटन किया गया था। नियमों के अनुसार, बिल्डरों को 68 फीसदी क्षेत्र में खेल सुविधाएं, 28 फीसदी में आवासीय और दो फीसदी में व्यावसायिक संपत्तियां विकसित करनी थीं। आरोप है कि खेल सुविधाएं विकसित करने के बजाय बिल्डरों ने मुनाफे के लिए इन चार बड़े भूखंडों को 84 छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर अलग-अलग बिल्डरों को बेच दिया। सबसे गंभीर आरोप यह है कि नोएडा प्राधिकरण ने नियमों के खिलाफ जाकर प्लॉट को बांटे जाने और रजिस्ट्री की अनुमति दे दी।
जनवरी 2021 में तत्कालीन नोएडा सीईओ रितु माहेश्वरी की अध्यक्षता में हुई बोर्ड बैठक में इस मामले से जुड़ा प्रस्ताव रखा गया। बोर्ड ने स्पोर्ट्स सिटी के भूखंडों पर अधिभोग प्रमाणपत्र जारी करने, मानचित्र स्वीकृति समेत सभी कार्यों पर रोक लगा दी। इसके साथ ही एसीईओ नेहा शर्मा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई।
समिति ने अगस्त 2021 में रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजी। शासन ने कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा, जिसके बाद सितंबर में संशोधित रिपोर्ट दोबारा भेजी गई। सूत्रों के मुताबिक शासन स्तर पर अब तक इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका और मामला फाइलों में दब गया।
सिस्टम पर उठे सवाल
16 जनवरी की रात हुए हादसे में इंजीनियर युवराज मेहता की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया। एसआईटी की जांच का सबसे अहम बिंदु यह है कि सूचना मिलने के बाद भी करीब दो घंटे तक युवराज को बचाने के प्रयास प्रभावी क्यों नहीं हो सके। साथ ही, कई अधिकारी मौके पर पहुंच गए थे। सोशल मीडिया पर आक्रोश देखने को मिला और लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन भी किए।
आरोप है कि तमाम संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद समय पर जरूरी इंतजाम नहीं किए गए। अदालत ने भी पुलिस को फटकार लगाते हुए निर्देश दिए हैं कि जांच में यह साफ किया जाए कि नाला टूटने, बैरिकेडिंग न होने और बचाव में देरी के लिए जिम्मेदार कौन है? जांच के बाद कार्रवाई तय मानी जा रही है।


